Saturday, October 1, 2011

विधवा बहू अनुकम्पा नियुक्ति की हकदार

विधवा बहू अनुकम्पा नियुक्ति की हकदार
 

जोधपुर। भारतीय समाज में बहू को भी बेटी के रूप में स्वीकार किया जाता है। "डॉटर-इन-लॉ" (बहू) शब्द का अर्थ यही है "इन-लॉज" (ससुराल वाले) उसे "डॉटर" (बेटी) के रूप में स्वीकार करते हैं। लिहाजा विधवा बेटी और बहू में फर्क नहीं किया जा सकता। बेटी और बहू के रिश्ते की व्याख्या करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने "मृत राज्य कर्मचारियों के आश्रितों को अनुकम्पात्मक नियुक्ति नियम-1996" के अंतर्गत एक विधवा बहू को ससुर के आश्रित के तौर पर सरकारी नौकरी पाने का हकदार माना।

न्यायाधीश गोविन्द माथुर ने पाली जिले की पिंकी के मामले में यह आदेश पारित किया। नियम 2(सी) के अन्तर्गत विधवा बहू के आश्रित की परिभाषा में नहीं आने की सरकार की दलील भी ठीक नहीं मानी। उन्होंने कहा, ये नियम उद्देश्य की व्याख्या साफ नहीं कर पा रहे हैं।

जबकि इनका मंतव्य राज्य कर्मचारी के परिवार की उन तकलीफों को कम करना है, जो इकलौते कमाऊ सदस्य (अर्निग मेम्बर) की मृत्यु के बाद परिवार को झेलनी पड़ती है।

लिहाजा नियमों की अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने "पर्पसिव कंस्ट्रक्शन" और "पर्पसिव इंटरप्रिटेशन" के विधिक सिद्धांतों का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि नियुक्ति नियम 5(1) में मृत राज्य कर्मचारी के आश्रितों में से किसी के पहले से सरकारी सेवा में होने पर नौकरी का लाभ नहीं दिया जाता, लेकिन विधवा बेटी को इससे मुक्त रखा गया है। यह माना जाना चाहिए कि कानून निर्माताओं ने विधवा बेटी पर उसके ससुराल वालों की जिम्मेदारी को ध्यान में रखकर ही उसे मुक्त रखा।

पति की मौत के बाद महिलाएं ससुराल में बेटी के रूप ही रहती हैं। लिहाजा नियम 2(सी) में उन्होंने विधवा बेटी के साथ विधवा बहू को भी शामिल मानते हुए पिंकी की याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही उसे 14 अक्टूबर तक नियमानुसार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में नियुक्ति देने के आदेश दिए।

यह था मामला...
पाली जिले में जैतारण तहसील अन्तर्गत देरारामसर-गरनिया की पिंकी के पति रतनलाल, ससुर मोहनलाल सीरवी एवं ननद सीता की 24 मई 2008 को दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। दादी सास सुवादेवी (80), सास जिमिया (53) तथा मासूम बेटियों कृष्णा व रामप्यारी की जिम्मेदारी पिंकी पर आ पड़ी। ससुर मोहनलाल सरकारी सेवा में पशुधन सहायक थे।

लिहाजा पिंकी ने मृत राज्य कर्मचारी के आश्रित के तौर पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मांगी, लेकिन राज्य सरकार ने विधवा बहू को इन नियमों में शामिल नहीं मान दावा खारिज कर दिया। विभाग का कहना था कि आश्रित के तौर पर केवल पति-पत्नी, बेटा, अविवाहित या विधवा बेटी तथा गोद ली हुई संतान को ही नौकरी दी जा सकती है।

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